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टिकट नहीं मिला तो सरकार के पुतले फूंके, अब फिर बीजेपी दरबार में हाजिरी — चुनाव आते ही बदले सुरों से गरमाई सियासत

टिकट नहीं मिला तो सरकार के पुतले फूंके, अब फिर बीजेपी दरबार में हाजिरी — चुनाव आते ही बदले सुरों से गरमाई सियासत

 

उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी आहट के साथ ही पुराने चेहरे फिर सक्रिय हो गए हैं, लेकिन इस बार चर्चा किसी नए नेता की नहीं बल्कि उन नेताओं की हो रही है जिन्होंने पिछली बार टिकट न मिलने पर बीजेपी सरकार और संगठन के खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया था। कभी सड़कों पर उतरकर सरकार के पुतले फूंकने वाले और समर्थकों से नारेबाजी कराने वाले यही नेता अब फिर उसी बीजेपी से टिकट मांगते नजर आ रहे हैं।

राजनीतिक गलियारों में इस बदलते रवैये को लेकर तीखी चर्चाएं शुरू हो गई हैं। लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर विचारधारा बड़ी है या कुर्सी की राजनीति?

पिछले चुनाव के दौरान टिकट कटते ही इन नेताओं के समर्थकों ने ऐसा हंगामा खड़ा किया था कि कई जगह संगठन को सफाई देनी पड़ गई थी। जगह-जगह प्रदर्शन हुए, सरकार के खिलाफ नारे लगे और गुस्से में पुतले तक फूंके गए। उस वक्त इन नेताओं ने पार्टी नेतृत्व पर “अनदेखी” और “अपमान” जैसे आरोप लगाए थे। कई समर्थक खुलेआम कहते घूम रहे थे कि अब बीजेपी को सबक सिखाया जाएगा।

लेकिन अब जैसे ही चुनाव करीब आए, वही नेता फिर पार्टी दफ्तरों और बड़े नेताओं के दरवाजों पर दिखाई देने लगे हैं। क्षेत्र में पोस्टर लग रहे हैं, समर्थकों की भीड़ जुटाई जा रही है और सोशल मीडिया पर खुद को बीजेपी का सबसे मजबूत सिपाही साबित करने की कोशिशें शुरू हो गई हैं।

सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि जिन समर्थकों ने कभी सरकार के खिलाफ आग उगली थी, वही अब “टिकट दो-टिकट दो” के नारे लगा रहे हैं। राजनीतिक जानकार इसे “सुविधानुसार विचारधारा” बता रहे हैं।

क्षेत्र में लोग चुटकी लेते हुए कह रहे हैं —

“जब टिकट नहीं मिला तो सरकार गलत थी, अब टिकट की उम्मीद जगी तो वही सरकार सबसे अच्छी लगने लगी!”

सूत्र बताते हैं कि कुछ दावेदार लगातार देहरादून और दिल्ली तक दौड़ लगा रहे हैं। संगठन में अपनी पकड़ दिखाने के लिए शक्ति प्रदर्शन भी किया जा रहा है। हालांकि पार्टी के पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं के बीच इस पूरे घटनाक्रम को लेकर नाराजगी भी देखने को मिल रही है। उनका कहना है कि वर्षों तक पार्टी के लिए संघर्ष करने वालों को दरकिनार कर ऐसे नेताओं को महत्व देना संगठन के लिए गलत संदेश होगा।

अब सवाल यह खड़ा हो रहा है कि क्या बीजेपी नेतृत्व उन चेहरों पर भरोसा करेगा जिन्होंने मुश्किल समय में पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोला था, या फिर उन कार्यकर्ताओं को मौका मिलेगा जो हर परिस्थिति में संगठन के साथ खड़े रहे।

फिलहाल चुनावी मौसम में बदले इन सियासी रंगों ने राजनीति का तापमान जरूर बढ़ा दिया है और जनता भी अब यह सब बड़ी बारीकी से देख रही है।

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