उच्च शिक्षा विभाग की वर्ष 2014 से 2022 तक की व्यवस्था से प्रभावित एवं वर्तमान में कार्यरत अस्थायी शिक्षकों ने अपनी मांगों को लेकर संघर्ष तेज कर दिया है। लंबे समय से सेवा असुरक्षा, कम मानदेय और समायोजन की समस्या से जूझ रहे शिक्षकों ने अब शासन से आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस एवं स्थायी निर्णय की मांग की है।
इसी क्रम में शिक्षक प्रतिनिधिमंडल ने पुनः उच्च शिक्षा मंत्री से मुलाकात कर अपनी समस्याओं और लंबित मांगों को रखा। प्रतिनिधिमंडल के अनुसार, मुलाकात के बावजूद मांगों के समाधान को लेकर कोई संतोषजनक एवं स्पष्ट निर्णय सामने नहीं आया। इसके बाद प्रतिनिधिमंडल ने कैबिनेट मंत्री श्री सौरभ बहुगुणा से मुलाकात कर अस्थायी शिक्षकों की सेवा अनिश्चितता, कम वेतन और समायोजन की समस्या से अवगत कराया।
प्रतिनिधिमंडल के अनुसार, कैबिनेट मंत्री ने इस विषय में सचिव से भी वार्ता की। सचिव की व्यस्तता के कारण प्रतिनिधिमंडल को लगभग तीन दिन बाद मुलाकात का समय दिए जाने की बात कही गई है। वहीं, शिक्षकों ने मुख्यमंत्री से भी मुलाकात का समय मांगा है। प्रतिनिधिमंडल के अनुसार मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से आगामी दो-तीन दिनों में समय दिए जाने की बात कही गई है।
तीन मांगों पर आर-पार के संघर्ष का संकेत
अस्थायी शिक्षकों का कहना है कि वे वर्षों से उच्च शिक्षा व्यवस्था में अपनी सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद उनका भविष्य आज भी अनिश्चित है। नियमित प्राध्यापक के आने पर पद प्रभावित होने की स्थिति में वर्षों से कार्यरत शिक्षक अचानक व्यवस्था से बाहर हो जाते हैं। शिक्षकों ने इस व्यवस्था में स्थायी समाधान की मांग की है।
शिक्षकों की तीन प्रमुख मांगें हैं—
पहली—समायोजन: नियमित प्राध्यापक के आने अथवा पद प्रभावित होने की स्थिति में वर्षों से कार्यरत अस्थायी शिक्षक को उचित व्यवस्था के अंतर्गत समायोजित किया जाए, ताकि उसकी वर्षों की सेवा और अनुभव व्यर्थ न जाए।
दूसरी—सम्मानजनक एवं समान वेतन: शिक्षकों के अनुसार वे वर्तमान में लगभग ₹35,000 प्रतिमाह पर कार्य कर रहे हैं, जबकि नियमित एवं अस्थायी शिक्षकों के बीच वेतन में बड़ा अंतर है। उनका कहना है कि समान प्रकार का शैक्षणिक कार्य करने वाले शिक्षकों के लिए समान कार्य के लिए समान एवं सम्मानजनक वेतन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
तीसरी—आयोग की परिधि से बाहर रखने की मांग: अस्थायी शिक्षक पदों को आयोग की परिधि से बाहर रखने की मांग की गई है, ताकि वर्षों से कार्यरत शिक्षकों के सामने बार-बार पद समाप्त होने अथवा सेवा से बाहर होने की स्थिति उत्पन्न न हो।
दो वर्षों से समायोजन की राह देख रहे शिक्षक
प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि कई शिक्षक पिछले लगभग दो वर्षों से समायोजन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। लंबे समय तक उच्च शिक्षा विभाग में सेवाएं देने के बावजूद व्यवस्था से बाहर हुए इन शिक्षकों के सामने रोजगार और भविष्य को लेकर गंभीर अनिश्चितता बनी हुई है।
शिक्षकों का कहना है कि यह केवल कुछ व्यक्तियों का मामला नहीं है, बल्कि वर्षों से उच्च शिक्षा व्यवस्था को अपनी सेवाएं देने वाले शिक्षकों के रोजगार, सम्मान और सुरक्षित भविष्य से जुड़ा विषय है। उनका कहना है कि बार-बार आश्वासन मिलने के बजाय अब शासन को स्पष्ट नीति एवं स्थायी समाधान की दिशा में निर्णय लेना चाहिए।
संख्या बल के साथ देहरादून पहुंचने का आह्वान
शिक्षक प्रतिनिधियों ने सभी प्रभावित एवं कार्यरत साथियों से अपील की है कि वे संघर्ष में सक्रिय भागीदारी करें और बारी-बारी से देहरादून पहुंचकर अपनी एकजुटता प्रदर्शित करें। प्रतिनिधियों का कहना है कि शासन, मंत्रीगण और प्रशासन के समक्ष शिक्षकों की समस्याओं को मजबूती से रखने के लिए एकता और संख्या बल दोनों आवश्यक हैं।
शिक्षक प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि उनका संघर्ष शांतिपूर्ण एवं लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगों के समाधान के लिए जारी रहेगा। उन्होंने कहा—
“अब केवल आश्वासन नहीं, ठोस निर्णय चाहिए। वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों के भविष्य के साथ अनिश्चितता का यह सिलसिला समाप्त होना चाहिए। संगठित होना ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है और एकजुट संघर्ष के माध्यम से ही सुरक्षित भविष्य की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।”
शिक्षक प्रतिनिधियों ने सभी प्रभावित एवं कार्यरत शिक्षकों से अपने अधिकारों, सम्मान और सुरक्षित भविष्य के लिए एकजुट होकर संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।
प्रतिनिधिमंडल में डॉ. रोहित, डॉ. मोहित, डॉ. मनोज, डॉ. शैलेश, डॉ. सरन, डॉ. प्रवेश, डॉ. चिंतामणि, डॉ. राकेश, डॉ. ममता, डॉ. जयहरी, डॉ. रणजीत, डॉ. ब्रह्मराज, डॉ. बबलू, डॉ. बिपिन, डॉ. प्रियंका, डॉ. धर्मेंद्र, डॉ. ममता सहित अन्य शिक्षक उपस्थित रहे।




