देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में शनिवार को उस समय बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया, जब प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने पार्टी में अपने महत्वपूर्ण पदों से इस्तीफा दे दिया। रावत के इस फैसले के बाद प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है।
हरीश रावत ने उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी की कार्यकारिणी के सदस्य पद के साथ-साथ कांग्रेस कार्यसमिति के स्थायी आमंत्रित सदस्य पद से भी इस्तीफा देने की घोषणा की है। उनका यह फैसला ऐसे समय सामने आया है, जब उनके पूर्व ओएसडी और सहयोगी चंदन सिंह जीना से जुड़े मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई को लेकर राजनीतिक माहौल गरमाया हुआ है।
रावत ने अपने फैसले के पीछे पार्टी की छवि और उसके संघर्ष को प्रमुख कारण बताया। उन्होंने कहा कि वह नहीं चाहते कि उनकी वजह से कांग्रेस की भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही लड़ाई कमजोर पड़े। उन्होंने पूरे मामले में जांच के बाद सच्चाई सामने आने की बात कही है।
जांच में सहयोग का दिया भरोसा
पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने कार्यकाल में हुई सरकारी भर्तियों का भी जिक्र किया और कहा कि यदि किसी मामले में उनकी कोई गलती या चूक प्रमाणित होती है तो वह जिम्मेदारी लेने से पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने जांच एजेंसियों से तथ्यों के आधार पर कार्रवाई करने की बात कही।
हरीश रावत के इस्तीफे को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की राजनीति में महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। हालांकि रावत ने संकेत दिया है कि पद छोड़ने के बावजूद वह कांग्रेस से जुड़े रहेंगे और पार्टी को मजबूत करने तथा आगामी चुनाव में कांग्रेस की जीत के लिए काम करते रहेंगे।
रावत के इस फैसले ने उत्तराखंड कांग्रेस के भीतर नई राजनीतिक चर्चाओं को जन्म दे दिया है। अब निगाहें कांग्रेस नेतृत्व की अगली रणनीति और इस घटनाक्रम के प्रदेश की राजनीति पर पड़ने वाले असर पर टिकी हैं।




