पिरान कलियर। साबिर पाक के सालाना उर्स/मेले में उमड़ी जायरीनों की भारी भीड़ के बीच जेबकतरी की घटनाओं ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जायरीनों को जेबकतरों से बचाने के लिए पुलिस की ओर से विशेष जेबकतरा एस्क्वायड तैनात किए जाने के बावजूद कई स्थानों पर जेबकतरे सक्रिय नजर आए। हैरानी की बात यह रही कि कई मामलों में पुलिस टीम से पहले जायरीनों ने खुद संदिग्धों को पकड़कर पुलिस के हवाले किया।
बताया जा रहा है कि उर्स के दौरान करीब दर्जनभर से अधिक संदिग्ध जेबकतरों को जायरीनों ने पकड़कर पुलिस को सौंपा। इसके बाद सबसे बड़ा सवाल उनकी आगे की कार्रवाई को लेकर खड़ा हो रहा है। पकड़े गए लोगों से पूछताछ हुई या नहीं? मुकदमा दर्ज किया गया या नहीं? यदि ये किसी संगठित गिरोह का हिस्सा थे तो पुलिस उनके नेटवर्क तक क्यों नहीं पहुंच पाई? इन सवालों का स्पष्ट जवाब अभी सामने नहीं आया है।
‘ठेके’ पर जेबकतरे बुलाए जाने की चर्चा
सूत्रों के हवाले से यह भी चर्चा है कि उर्स में जेबकतरी के लिए सीमावर्ती राज्य से कथित तौर पर कुछ जेबकतरों को ‘ठेके’ पर बुलाए जाने की बात सामने आ रही है। यदि जांच में यह तथ्य सही पाया जाता है तो यह मामला केवल जेबकतरी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके पीछे सक्रिय नेटवर्क और स्थानीय स्तर पर संभावित संरक्षण की भी जांच जरूरी होगी।
क्षेत्र में नगर पंचायत के मुकर्रबपुर निवासी एक व्यक्ति पर कथित तौर पर बाहरी जेबकतरों को संरक्षण देने के आरोपों की भी चर्चा है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए मामले की निष्पक्ष जांच के बाद ही तस्वीर साफ हो सकेगी।
इन जायरीनों की जेब कटी, सामान हुआ चोरी
उर्स में पहुंचे कई जायरीनों ने जेबकतरी और चोरी की शिकायतें की हैं। झांसी निवासी खलील का बैग, बनारस निवासी मुस्तफा का मोबाइल, रामपुर निवासी तालिब का आईफोन और हापुड़ निवासी फुरकान का मोबाइल चोरी होने की शिकायत सामने आई। वहीं एटा निवासी शाकिर की नगदी तथा हसनपुर अमरोहा निवासी नईम और बुलंदशहर निवासी रहीश की जेब कटने की बात भी सामने आई है।
कुछ जायरीनों ने पुलिस को तहरीर देकर कार्रवाई की मांग की है। वहीं कई लोगों द्वारा संदिग्ध जेबकतरों को मौके पर पकड़कर पुलिस के हवाले किए जाने की भी जानकारी सामने आई है।
पीआरडी जवानों की भूमिका पर भी सवाल
उर्स/मेले की ड्यूटी में तैनात कुछ पीआरडी जवानों की भूमिका को लेकर भी स्थानीय स्तर पर सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की भी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में सवाल यह है कि सुरक्षा व्यवस्था में तैनाती के बावजूद जेबकतरे भीड़ के बीच लगातार सक्रिय कैसे रहे?
सबसे बड़ा सवाल—पकड़े गए जेबकतरे गए कहां?
पूरे मामले में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जायरीनों ने जिन संदिग्धों को पकड़कर पुलिस के हवाले किया, उनके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई? यदि कार्रवाई हुई तो कितने लोगों पर मुकदमा दर्ज किया गया और कितनों से पूछताछ हुई? और यदि कार्रवाई नहीं हुई तो इसकी वजह क्या रही?
जायरीनों का कहना है कि वे अपनी सतर्कता से संदिग्धों को पकड़कर पुलिस तक पहुंचाते रहे, लेकिन बाद की कार्रवाई स्पष्ट न होने से पुलिस व्यवस्था को लेकर उनका भरोसा प्रभावित हो रहा है।
अब सवाल सिर्फ जेबकतरी का नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क का है—उर्स की भीड़ में बाहरी संदिग्ध कैसे पहुंचे, उन्हें संरक्षण किसने दिया और पकड़े जाने के बाद उन पर क्या कार्रवाई हुई? इन सवालों के जवाब पुलिस जांच के बाद ही सामने आ सकेंगे। उच्चाधिकारियों से मामले में पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन फिलहाल जांच का हवाला दिया गया है।



