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*पतंजलि विश्वविद्यालय में 29 से 31 अक्टूबर तक होगा 52वाँ अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन*

 भारतीय ज्ञान परंपरा, वैदिक चिंतन, प्राचीन शास्त्रों एवं उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करने की दिशा में पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार में 29 से 31 अक्टूबर 2026 तक 52वें अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन (AIOC) का भव्य आयोजन किया जाएगा। एक शताब्दी से अधिक की गौरवशाली परंपरा वाले इस प्रतिष्ठित सम्मेलन में देश-विदेश के विद्वान, शिक्षाविद्, शोधार्थी एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्येता विभिन्न विषयों पर अपने शोध एवं विचार प्रस्तुत करेंगे। यह सम्मेलन उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, भारतीय वैदिक विचारधारा, प्राचीन साहित्य और ज्ञान-विज्ञान को समर्पित विशाल पुस्तक मेला एवं आकर्षक प्रदर्शनी स्टॉल होंगे। 

इनके माध्यम से आगंतुकों को भारतीय संस्कृति की विविधता, प्राचीन ग्रंथों की समृद्धशाली परंपरा, उत्तराखंड की लोककलाओं, पारंपरिक जीवनशैली, खान-पान, हस्तशिल्प एवं आध्यात्मिक परंपराओं से परिचित होने का अवसर मिलेगा। पुस्तक मेले में भारतीय ज्ञान-विज्ञान, वेद, उपनिषद्, दर्शन, संस्कृत साहित्य, योग, आयुर्वेद, बौद्ध दर्शन एवं अन्य शास्त्रीय विषयों से संबंधित पुस्तकों और शोध साहित्य को विशेष स्थान दिए जाने की योजना है।

 

*सम्मेलन का मुख्य आकर्षण रहेगा विशाल पुस्तक मेला*

सम्मेलन में विशाल पुस्तक मेले के माध्यम से विद्यार्थियों, शोधार्थियों, शिक्षकों और पुस्तक प्रेमियों को दुर्लभ पुस्तकों, प्राचीन ग्रंथों, नवीन शोध प्रकाशनों तथा भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित साहित्य को देखने और जानने का अवसर प्राप्त होगा। यह पहल सम्मेलन को केवल अकादमिक विमर्श तक सीमित न रखकर जनसामान्य, युवाओं और नई पीढ़ी को भारतीय सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का सशक्त माध्यम बनेगी।

 

*बौद्ध दर्शन से लेकर वैदिक अध्ययन और बाल साहित्य तक होगा व्यापक विमर्श*

सम्मेलन की अकादमिक रूपरेखा भारतीय ज्ञान-विज्ञान के विविध आयामों को समाहित करती है। इसमें योग, आयुर्वेद एवं अन्य प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों के साथ-साथ वैदिक अध्ययन, बौद्ध दर्शन, पालि साहित्य, जैन अध्ययन, संस्कृत एवं शास्त्रीय भाषाओं, भारतीय दर्शन, धर्मशास्त्र, इतिहास, पुराण, पुरातत्त्व और पांडुलिपि विज्ञान जैसे विषयों पर विचार-विमर्श प्रस्तावित हैं। इसके अतिरिक्त प्राचीन भारत में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, भारतीय भाषाओं एवं व्याकरण, संस्कृत और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), संगणकीय भाषाविज्ञान, भारतीय ललित कलाओं, भारतीय काव्यशास्त्र, आधुनिक संस्कृत साहित्य, प्राचीन भारतीय शिक्षा-पद्धति तथा भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) पर भी शोधपरक चर्चा होगी।

सम्मेलन के प्रमुख अकादमिक विषयों में भारतीय अनुसंधान पद्धतियाँ, कुम्भ का रहस्य एवं सांस्कृतिक-दार्शनिक महत्त्व, भारतविद्या, ईरानी, अरबी, फारसी एवं एशियाई अध्ययन तथा बाल-साहित्य भी शामिल हैं। इन विषयों के माध्यम से भारतीय सभ्यता के ऐतिहासिक, भाषायी, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और सामाजिक पक्षों को समकालीन संदर्भों में समझने का प्रयास किया जाएगा।

 

*देशभर के विषय विशेषज्ञ प्रस्तुत करेंगे शोध एवं विचार*

सम्मेलन में विभिन्न अकादमिक विषयों के विशेषज्ञों एवं अनुभवी विद्वानों के मार्गदर्शन में शोध-पत्रों और विचार-विमर्श के सत्र आयोजित किए जाएँगे। वैदिक अध्ययन, पालि एवं बौद्ध अध्ययन, प्राकृत एवं जैन अध्ययन, भारतीय दर्शन, संस्कृत साहित्य, प्राचीन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकीं, भारतीय ज्ञान प्रणाली और योग-आयुर्वेद जैसे क्षेत्रों में विद्वानों की सहभागिता सम्मेलन को व्यापक अकादमिक आयाम प्रदान करेगी।

 

*अतिथि सत्कार एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों की विशेष तैयारी*

देश-विदेश से आने वाले अतिथियों के स्वागत एवं सत्कार को विशेष प्राथमिकता दी जा रही है। विश्वविद्यालय परिसर को आकर्षक रूप से सजाने के साथ-साथ अतिथियों के आवास, भोजन, परिवहन, पंजीकरण एवं अन्य व्यवस्थाओं को सुचारु बनाने के लिए संबंधित समितियाँ सक्रिय हैं। सम्मेलन के दौरान विद्यार्थियों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाने की भी तैयारी है, जिनके माध्यम से भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और उत्तराखंड की सांस्कृतिक विविधता की झलक देखने को मिलेगी।

इन्हीं बिन्दुओं को मूर्त्तरूप प्रदान करने के लिए प्रति कुलपति साध्वी डॉ. देवप्रिया जी के निर्देशन में एक बैठक आयोजित की गई जिसमें व्यवस्थाओं, आवश्यक संसाधनों, प्रतिभागियों की सुविधाओं तथा आयोजन को सुव्यवस्थित एवं प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए। सभी समितियाँ सम्मेलन को शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से यादगार बनाने के लिए समन्वित रूप से कार्य कर रही हैं।

बैठक में साध्वी डॉ. देवप्रिया जी ने कहा कि इस आयोजन का उद्देश्य प्राचीन भारतीय ज्ञान के विभिन्न अनुशासनों के बीच संवाद को प्रोत्साहित करना, शोध की नई संभावनाओं को सामने लाना तथा पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक अनुसंधान के बीच सार्थक समन्वय स्थापित करना है।

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