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धनौरी इंटर कॉलेज की 160 बीघा शैक्षणिक भूमि विवाद ने पकड़ा तूल, हाईकोर्ट के आदेश के बाद निष्पक्ष जांच की मांग तेज

 

 

हरिद्वार। जनपद हरिद्वार के बहुचर्चित नेशनल इंटर कॉलेज, धनौरी की लगभग 160 बीघा सार्वजनिक शैक्षणिक भूमि के कथित अवैध विक्रय का मामला एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। उत्तराखंड हाईकोर्ट के आदेश के बाद इस प्रकरण में कानूनी और प्रशासनिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। मामले को लेकर नेशनल पब्लिक सर्विस ट्रस्ट के सचिव प्रियांशु कम्बोज ने विधि विशेषज्ञ कृष्णकांत के मार्गदर्शन में जिलाधिकारी हरिद्वार को विस्तृत अभ्यावेदन सौंपकर पूरे प्रकरण की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है।

अभ्यावेदन में आरोप लगाया गया है कि करोड़ों रुपये मूल्य की लगभग 160 बीघा ग्राम समाज की सार्वजनिक शैक्षणिक भूमि, जिसे ग्राम सभा शिवदासपुर तेलीवाला द्वारा केवल शिक्षा के उद्देश्य से कॉलेज को उपलब्ध कराया गया था, उसका कथित रूप से बिना वैधानिक अधिकार के विक्रय कर दिया गया। शिकायत में कॉलेज प्रबंधन से जुड़े कुछ लोगों पर नियमों की अनदेखी करते हुए सार्वजनिक संपत्ति के हस्तांतरण का आरोप लगाया गया है।

शिकायतकर्ता का दावा है कि भूमि विक्रय के दौरान कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों का सहारा लिया गया, आवश्यक प्रशासनिक अनुमतियां प्राप्त नहीं की गईं तथा भूमि का सौदा वास्तविक बाजार मूल्य से कम कीमत पर कर सार्वजनिक संपत्ति को आर्थिक नुकसान पहुंचाया गया। अभ्यावेदन में पूरे प्रकरण को सुनियोजित षड्यंत्र बताते हुए इससे जुड़े सभी अधिकारियों एवं लाभार्थियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच की मांग की गई है।

 

हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में जिलाधिकारी को दिए गए अभ्यावेदन में मांग की गई है कि भूमि विक्रय से संबंधित सभी अभिलेख, अनुमतियां, वित्तीय लेन-देन और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की गहन जांच कराई जाए। साथ ही, यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो भूमि विक्रय को निरस्त कर सार्वजनिक शैक्षणिक भूमि को उसके मूल उद्देश्य के लिए सुरक्षित किया जाए तथा दोषी पाए जाने वाले सभी जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता एवं अन्य लागू कानूनों के तहत कड़ी आपराधिक, राजस्व और विभागीय कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

 

अब सभी की निगाहें जिला प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि मामले की निष्पक्ष जांच होती है, तो यह न केवल सार्वजनिक शैक्षणिक संपत्तियों की सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा, बल्कि सरकारी भूमि के संरक्षण और जवाबदेही तय करने की दिशा में भी एक अहम मिसाल साबित हो सकता है।

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