इमलीखेड़ा गांव में विकास के दावों की सच्चाई उस समय सामने आ गई जब एक मृतक की अंतिम यात्रा को शमशान घाट तक पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को कीचड़ और दलदल से भरे रास्ते से गुजरना पड़ा। जिस रास्ते से लोगों को अपने परिजन की अंतिम विदाई देनी थी, वहां सड़क की जगह गंदगी, पानी और कीचड़ ने ग्रामीणों को मजबूर कर दिया कि वे कंधों पर अर्थी उठाकर फिसलते हुए आगे बढ़ें।
यह दृश्य केवल एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि उन तमाम सरकारी दावों पर बड़ा सवाल है जिनमें “गांव-गांव विकास” के बड़े-बड़े विज्ञापन किए जाते हैं। इमलीखेड़ा के लोगों का कहना है कि शमशान घाट तक सड़क निर्माण की मांग कई वर्षों से की जा रही है, लेकिन हर चुनाव में केवल आश्वासन दिए गए और बाद में जनता को भूल जाया गया।
ग्रामीणों के अनुसार भाजपा नेताओं और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने कई बार गांव पहुंचकर सड़क निर्माण कराने का वादा किया था। मंचों से भाषण हुए, विकास योजनाओं के पोस्टर लगे, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी बदहाल है। हालत यह है कि गांव में मृत व्यक्ति की अंतिम यात्रा तक सम्मानपूर्वक नहीं निकल पा रही।
बारिश के कारण रास्ता पूरी तरह दलदल में बदल चुका है। अंतिम यात्रा में शामिल बुजुर्ग, महिलाएं और युवा कीचड़ में फंसते रहे। कई लोगों के कपड़े खराब हुए और अर्थी ले जा रहे लोगों को बार-बार संभलना पड़ा। इस घटना के बाद ग्रामीणों में भारी रोष है। लोगों का कहना है कि जब शमशान घाट तक जाने का रास्ता तक नहीं बन पाया, तो सरकार आखिर किस विकास की बात कर रही है?
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि गांव की समस्याओं को जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है। चुनाव के समय वोट मांगने आने वाले नेता अब गांव की ओर झांकने तक नहीं आते। लोगों का कहना है कि यदि किसी बड़े नेता या अधिकारी को इसी रास्ते से गुजरना पड़ता, तो शायद सड़क एक ही रात में बन जाती।
गांव के बुजुर्गों ने कहा कि यह केवल सड़क का मुद्दा नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा मामला है। किसी परिवार के दुख की घड़ी में भी उन्हें इस तरह की परेशानी झेलनी पड़े, इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है।
अब ग्रामीणों ने प्रशासन और सरकार को चेतावनी दी है कि यदि जल्द शमशान घाट तक पक्की सड़क का निर्माण नहीं कराया गया तो गांव के लोग आंदोलन करने को मजबूर होंगे। लोगों ने मांग की है कि केवल घोषणाओं और भाषणों से नहीं, बल्कि जमीन पर विकास दिखाई देना चाहिए।



