। भगवान श्रीराम की लीलाओं का मंचन केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सत्य, त्याग, मर्यादा, कर्तव्य और आदर्श जीवन का संदेश देने का माध्यम है। लेकिन जब इसी मंच पर जनप्रतिनिधियों के भाषणों में चुनावी चर्चाएं सुनाई देने लगें, तो लोगों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या रामलीला का मंच भी अब राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र बनता जा रहा है?
रामलीला मंच पर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को उम्मीद रहती है कि उन्हें भगवान श्रीराम के जीवन, उनके आदर्शों और समाज के प्रति उनके कर्तव्यों से जुड़ा संदेश सुनने को मिलेगा। श्रीराम का जीवन सिखाता है कि सत्ता से बढ़कर मर्यादा, राजनीति से बढ़कर कर्तव्य और व्यक्तिगत हितों से बढ़कर जनकल्याण होना चाहिए।
ऐसे में यदि धार्मिक आयोजन के दौरान जनप्रतिनिधियों की चर्चाओं में चुनावी मुद्दे प्रमुखता से सामने आने लगें, तो यह विचार करना जरूरी है कि धार्मिक मंच की मूल भावना को किस तरह बनाए रखा जाए। जनप्रतिनिधियों के लिए रामलीला मंच जनता से संवाद करने का अवसर जरूर हो सकता है, लेकिन इस संवाद में भगवान श्रीराम के आदर्शों और धार्मिक आयोजन की गरिमा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यही है—रामलीला मंच से जनता को भगवान श्रीराम की मर्यादा का संदेश दिया जा रहा है या चुनावी राजनीति की चर्चा की जा रही है?
लोकतंत्र में राजनीति अपनी जगह महत्वपूर्ण है और धार्मिक आयोजन अपनी जगह। दोनों के उद्देश्यों में अंतर बनाए रखना ही सामाजिक सद्भाव और मंच की गरिमा के लिए जरूरी है। रामलीला का मंच किसी दल या व्यक्ति की राजनीति से ऊपर उठकर भगवान श्रीराम के आदर्शों, भाईचारे और समाज को सही दिशा देने का माध्यम बने, यही श्रद्धालुओं की अपेक्षा होनी चाहिए।
अब सवाल जनप्रतिनिधियों से भी है कि वे रामलीला मंच पर पहुंचकर श्रीराम के आदर्शों को जन-जन तक पहुंचाने को प्राथमिकता देंगे या चुनावी चर्चाओं को?




