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पञ्चमी राष्ट्रीय स्वर्णशलाका प्रतियोगिता में ज्ञान का महाकुंभ, मेधावियों पर बरसी 50 लाख की छात्रवृत्ति व पुरस्कार राशि

 

 

    रिपोर्ट अभिषेक सैनी 

। भारतीय ज्ञान परम्परा, संस्कृत और शास्त्रीय अध्ययन के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से पतंजलि विश्वविद्यालय में आयोजित पञ्चमी राष्ट्रीय स्वर्णशलाका प्रतियोगिता (2026–27) का भव्य सम्मान समारोह गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ। देशभर के विभिन्न गुरुकुलों, विश्वविद्यालयों एवं शिक्षण संस्थानों से आए मेधावी विद्यार्थियों का सम्मान किया गया। इस अवसर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के बीच लगभग 50 लाख रुपये की छात्रवृत्ति एवं पुरस्कार राशि वितरित की गई। समारोह भारतीय संस्कृति, संस्कृत और सनातन ज्ञान परम्परा के प्रति समर्पण, गौरव और राष्ट्रीय चेतना का अद्भुत संगम बन गया।

पतंजलि विश्वविद्यालय के कुलाधिपति स्वामी रामदेव ने मेधावी विद्यार्थियों को सम्मानित करते हुए कहा कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी सनातन ज्ञान परम्परा, संस्कार और संस्कृति है। उन्होंने कहा कि आज एक ओर ऐसे युवा हैं जो वेद, उपनिषद, श्रीमद्भगवद्गीता, चरक संहिता, घेरण्ड संहिता, योग, दर्शन और संस्कृत का अध्ययन एवं कण्ठस्थ कर भारतीय संस्कृति को आगे बढ़ा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग विरोध के नाम पर अराजकता और अमर्यादित भाषा का प्रयोग कर देश की संस्कृति को आहत करने का प्रयास करते हैं। भारत की पहचान मर्यादा, संवाद, शिष्टाचार और संस्कार से है। उन्होंने कहा कि पतंजलि विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि ऐसे राष्ट्रनिष्ठ, संस्कारित और चरित्रवान युवाओं का निर्माण करना है जो भारतीय संस्कृति के सच्चे संवाहक बनें।

उन्होंने कहा कि पतंजलि विश्वविद्यालय और उससे जुड़े गुरुकुलों में हजारों विद्यार्थी भारतीय ज्ञान-विज्ञान, योग, आयुर्वेद, दर्शन और संस्कृत का अध्ययन कर राष्ट्र निर्माण की मजबूत नींव तैयार कर रहे हैं। यही युवा भविष्य में भारत को विश्वगुरु बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

 

समारोह में मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति गुरपाल सिंह आहलूवालिया ने पतंजलि विश्वविद्यालय द्वारा भारतीय संस्कृति, संस्कृत और शास्त्रीय शिक्षा के संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों की मुक्तकंठ से सराहना की। उन्होंने कहा कि आज पूरी दुनिया भारतीय ज्ञान परम्परा की ओर आकर्षित हो रही है और ऐसे समय में पतंजलि विश्वविद्यालय जैसी संस्थाएं देश की सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने का ऐतिहासिक कार्य कर रही हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि शास्त्रों का अध्ययन केवल विद्वत्ता नहीं देता, बल्कि चरित्र, नैतिकता और राष्ट्रसेवा की भावना भी विकसित करता है।

 

राष्ट्रीय स्वर्णशलाका प्रतियोगिता में पतंजलि विश्वविद्यालय, पतंजलि गुरुकुलम्, पतंजलि कन्या गुरुकुलम्, पतंजलि आयुर्वेद कॉलेज, स्वामी दर्शनानन्द गुरुकुल महाविद्यालय, आचार्यकुलम् हरिद्वार, रांची, चिरगांव, कुमारी कटरा, देवप्रयाग सहित देशभर के अनेक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों ने भाग लेकर भारतीय शास्त्रीय परम्परा का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।

 

राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न शास्त्रों में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने वाले वेदभानु, साध्वी देववाणी, साध्वी देवांशी, कृष्णाशीष, जाह्नवी, अधिता, राशि, अंजलि, साक्षी और गौरिका को विशेष सम्मान प्रदान किया गया। वहीं दत्तात्रेय, आदर्श, ज्योति, देवार्पणा, ओजस, अधित, साध्वी देवदीक्षा, साध्वी देवनिधि, साध्वी देवसिद्धि, साध्वी देवस्मृति, निशा और देव कल्याणी सहित अनेक प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को भी उनकी उल्लेखनीय उपलब्धियों के लिए सम्मानित किया गया।

 

समारोह का सबसे आकर्षक क्षण तब आया जब विभिन्न श्रेणियों में शास्त्रों का कण्ठस्थ अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों के बीच लगभग 50 लाख रुपये की छात्रवृत्ति एवं पुरस्कार राशि वितरित की गई। आयोजकों ने बताया कि इस पहल का उद्देश्य नई पीढ़ी को भारतीय ज्ञान परम्परा, संस्कृत एवं शास्त्रीय साहित्य के गंभीर अध्ययन के लिए प्रेरित करना तथा उन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना है।

 

मानविकी संकाय की अधिष्ठाता एवं दर्शन विभागाध्यक्ष साध्वी डॉ. देवप्रिया ने कहा कि पतंजलि विश्वविद्यालय में शिक्षा का लक्ष्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि राष्ट्रभाव, नैतिक मूल्यों, आध्यात्मिक चेतना और भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की भावना का विकास करना है। उन्होंने विश्वास जताया कि यहां का प्रत्येक विद्यार्थी भारतीय संस्कृति का सशक्त प्रतिनिधि बनकर विश्वभर में सनातन ज्ञान परम्परा का संदेश पहुंचाएगा।

 

कार्यक्रम में प्रो-वाइस चांसलर प्रो. (डॉ.) मयंक अग्रवाल, डीन रिसर्च डॉ. ऋत्विक बिसारिया, परीक्षा नियंत्रक ए.के. सिंह, विश्वविद्यालय के संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शिक्षक, शोधार्थी, विभिन्न शिक्षण संस्थानों के प्रतिनिधि तथा बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।

 

समारोह के अंत में सभी विजेता विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं सहभागी संस्थानों को शुभकामनाएं देते हुए भारतीय ज्ञान परम्परा, संस्कृत, शास्त्रीय अध्ययन और सनातन संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन का सामूहिक संकल्प दोहराया गया। पूरे कार्यक्रम में भारतीय संस्कृति, संस्कृत अध्ययन और संस्कारमूलक शिक्षा के प्रति उत्साह, गौरव और राष्ट्रभक्ति का अनुपम वातावरण देखने को मिला।यदि चाहें, मैं इसे अखबार की फ्रंट पेज शैली में और अधिक प्रभावशाली शीर्षक, उपशीर्षक और समाचार प्रस्तुति के साथ भी तैयार कर सकता हूँ।

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