स्थित क्वांटम विश्वविद्यालय में “भारतीय ज्ञान प्रणाली के मूल स्तंभ: अतीत, वर्तमान और भविष्य” विषय पर एक गरिमामय एवं ज्ञानवर्धक अतिथि व्याख्यान का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों एवं शिक्षकों को भारतीय ज्ञान परंपरा की मूल अवधारणाओं, उसकी ऐतिहासिक प्रासंगिकता तथा समकालीन उपयोगिता से अवगत कराना था।

इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. विस्वजननी सत्तिगेरी, प्रमुख, सीएसआईआर–ट्रेडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी यूनिट, नई दिल्ली ने अपने विचार प्रस्तुत किए। कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डॉ.) विवेक कुमार द्वारा मुख्य अतिथि के स्वागत उद्बोधन के साथ हुआ। उन्होंने अपने उद्बोधन में भारतीय ज्ञान प्रणाली के पुनरुत्थान की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि यह केवल हमारी सांस्कृतिक धरोहर ही नहीं, बल्कि भविष्य के सतत विकास का आधार भी है।

इस अवसर पर क्वांटम स्कूल ऑफ बिजनेस के निदेशक डॉ. मनीष श्रीवास्तव ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली प्रबंधन, नैतिकता एवं जीवन कौशल के क्षेत्र में अत्यंत प्रासंगिक है।
अपने विस्तृत एवं शोधपरक व्याख्यान में डॉ. सत्तिगेरी ने भारतीय ज्ञान प्रणाली के तीन प्रमुख स्तंभों—दृष्टि , परंपरा एवं लौकिकप्रयोजनम् का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘दृष्टि’ भारतीय संस्कृति एवं जीवन मूल्यों पर आधारित एक समग्र और संतुलित दृष्टिकोण है, जो ज्ञान को केवल सैद्धांतिक नहीं बल्कि जीवनोपयोगी बनाता है। ‘परंपरा’ के अंतर्गत उन्होंने उस सतत ज्ञान प्रवाह को रेखांकित किया, जो हजारों वर्षों से गुरु-शिष्य परंपरा तथा ग्रंथों के माध्यम से संरक्षित रहा है। वहीं ‘लौकिकप्रयोजनम्’ को उन्होंने व्यावहारिकता से जोड़ते हुए बताया कि भारतीय ज्ञान प्रणाली सदैव समाज की वास्तविक समस्याओं के समाधान हेतु प्रयुक्त होती रही है।

उन्होंने भारतीय ज्ञान प्रणाली की उत्पत्ति वैदिक साहित्य से जोड़ते हुए दर्शन, आयुर्वेद, गणित एवं खगोल विज्ञान जैसे क्षेत्रों में इसके बहुआयामी योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि प्राचीन भारत में ज्ञान का संप्रेषण मौखिक एवं लिखित दोनों माध्यमों से होता था, जिससे इसकी निरंतरता एवं प्रामाणिकता बनी रही।
अपने व्याख्यान के दौरान डॉ. सत्तिगेरी ने सीएसआईआर द्वारा विकसित ट्रेडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी (टीकेडीएल) की भूमिका को विशेष रूप से रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि टीकेडीएल एक अभिनव डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जो आयुर्वेद, यूनानी एवं योग जैसे पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक रूप से प्रलेखित कर वैश्विक स्तर पर उपलब्ध कराता है। यह पहल न केवल भारत की पारंपरिक धरोहर के संरक्षण में सहायक है, बल्कि बायोपाइरेसी को रोकने एवं बौद्धिक संपदा अधिकारों (आईपीआर) की सुरक्षा सुनिश्चित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

डॉ. सत्तिगेरी ने भविष्य की दिशा पर प्रकाश डालते हुए भारतीय ज्ञान प्रणाली के कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), डिजिटल प्रौद्योगिकी एवं सतत विकास लक्ष्यों के साथ एकीकरण की संभावनाओं को रेखांकित किया। उन्होंने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि वे भारतीय ज्ञान के इन मूल स्तंभों के आधार पर जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य सेवाओं एवं सामाजिक चुनौतियों के समाधान हेतु नवाचार करें और वैश्विक स्तर पर भारत की बौद्धिक परंपरा को सशक्त बनाएं
कार्यक्रम के अंत में बीबीए समन्वयक डॉ. निर्मेष शर्मा द्वारा औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया गया। उन्होंने मुख्य वक्ता के ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायी विचारों के लिए आभार व्यक्त करते हुए आयोजन की सफलता में सभी की सक्रिय सहभागिता की सराहना
इस अवसर पर 120 से अधिक छात्र-छात्राओं, शोधार्थियों एवं शिक्षकों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित प्रश्नोत्तर सत्र अत्यंत संवादात्मक रहा, जिसमें प्रतिभागियों ने भारतीय ज्ञान प्रणाली के विभिन्न आयामों पर अपने प्रश्न प्रस्तुत किए और विषय की गहन समझ प्राप्त की।
कार्यक्रम ने भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ इसे समकालीन शिक्षा एवं अनुसंधान से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज कराई।




