* मदरहुड विश्वविद्यालय, रुड़की के परिसर में आज Indian Knowledge System as Backbone of Law: Tracing Ancient Roots and Shaping Present Relevance” विषय पर ‘राष्ट्रीय विधिक चौपाल 1.0’ का भव्य शुभांरभ हुआ। कार्यक्रम में देश के प्रतिष्ठित शिक्षाविदों, नीति विशेषज्ञों एवं विधि विशेषज्ञों ने प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विधिक प्रणाली के अंतर्संबंधों पर गहन मंथन किया।
कार्यक्रम के संरक्षक एवं मदरहुड विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो० (डॉ०) नरेंद्र शर्मा ने उद्घाटन सत्र में कहा, “विधि केवल दंड देने का साधन नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाला सूत्र है। धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र जैसे ग्रंथों में निहित न्याय के सिद्धांत आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। भारतीय ज्ञान प्रणाली को पश्चिमी ढांचे में ढालने की बजाय, हमें अपने मूल से प्रेरणा लेकर एक समावेशी विधिक ढांचा विकसित करना होगा। यह चौपाल उसी दिशा में एक प्रयास है।”
मुख्य अतिथि के रूप में पधारे सलाहकार असम राज्यपाल, प्रो० (डॉ०) हरबंश दीक्षित ने अपने संबोधन में कहा, “मनुस्मृति से लेकर कौटिल्य के अर्थशास्त्र तक, भारत में कानून कभी भी केवल राजाज्ञा नहीं रहा। वह धर्म, नीति और लोक-कल्याण का समन्वय था। आज जब हम ‘न्याय सबके लिए’ की बात करते हैं, तो हमें अपनी पंचायत प्रणाली, ग्राम न्याय और पुनर्स्थापनात्मक न्याय की परंपरा को याद करना होगा। भारतीय ज्ञान परंपरा दंडात्मक नहीं, सुधारात्मक न्याय पर बल देती है।”
विशेष अतिथि के रूप में पधारे प्रो० (डॉ०) देवेंद्र भसीन, उपाध्यक्ष, राज्य उच्च शिक्षा उन्नयन समिति, उत्तराखण्ड सरकार ने कहा, “नई शिक्षा नीति 2020 में ‘भारतीय ज्ञान प्रणाली’ को केंद्र में रखा गया है। विधि शिक्षा में भी अब हमें ‘डिकोलोनाइजेशन ऑफ लॉ’ की बात करनी होगी। हमारे छात्रों को केवल विधिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि याज्ञवल्क्य स्मृति और नारद स्मृति में वर्णित न्यायिक प्रक्रियाएं भी पढ़ाई जानी चाहिए। तभी हम वास्तव में ‘भारतीय विधिशास्त्र’ विकसित कर पाएंगे।”
प्रो० (डॉ०) अनिल दीक्षित, प्रोफेसर लॉ कॉलेज उत्तरांचल यूनिवर्सिटी ने कहा, “आज साइबर अपराध और डाटा चोरी जैसी चुनौतियां हैं। लेकिन ‘आचार: परमो धर्मः’ का सिद्धांत हमें सिखाता है कि तकनीक का उपयोग भी नैतिकता के दायरे में होना चाहिए। मीडिया ट्रायल पर रोक लगाने के लिए भी हमें ‘वाक् संयम’ की प्राचीन अवधारणा से सीखना होगा।” साथी ही इन्होंने कहा कि, “कौटिल्य ने 2300 साल पहले कर-प्रणाली, व्यापार कानून और उपभोक्ता संरक्षण पर जो लिखा, वह आज के जीएसटी और कंज्यूमर प्रोटक्शन एक्ट से मेल खाता है। कानून और अर्थव्यवस्था का यह प्राचीन समन्वय हमें ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लिए भी मार्ग दिखाता है। विधि को केवल वकीलों का विषय न बनाकर नीति-निर्माण का आधार बनाना होगा।”
डॉ० लक्ष्मी प्रिया विनजामुरी ने कहा कि, “पर्यावरण कानून में ‘प्रकृति: रक्षति रक्षिता:’ का सिद्धांत आज के सतत विकास से कहीं अधिक गहरा है। भारतीय परंपरा में नदी, वृक्ष और पशु को भी विधिक व्यक्तित्व प्राप्त था। बौद्धिक संपदा में ‘विद्या दान’ की अवधारणा हमें ओपन सोर्स और टेक्निकल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी की ओर ले जाती है।”
यूपीईएस देहरादून से पैनलिस्ट के रूप में पधारे डॉ० गगनदीप कौर, ने कहा, “डाटा संरक्षण कानून बनाते समय हमें ‘गोपनीयता’ को केवल अधिकार नहीं, बल्कि ‘मर्यादा’ के रूप में देखना होगा। उपनिषद कहते हैं ‘मातृ देवो भव’, यानी गोपनीयता और सम्मान परस्पर जुड़े हैं। भारत का DPDP Act 2023 इस दर्शन को तभी आत्मसात कर पाएगा जब हम इसे भारतीय मूल्यों से जोड़ेंगे।”
कार्यक्रम के अंत में सभी अतिथियों ने एकमत से कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली को पाठ्यक्रम में शामिल करना समय की मांग है। इससे न केवल छात्रों में अपनी जड़ों के प्रति गर्व पैदा होगा, बल्कि भारत एक ‘विधिक गुरु’ के रूप में विश्व का मार्गदर्शन भी कर सकेगा।
मंच का संचालन डॉ० दीपशिखा के द्वारा किया गया।
कार्यक्रम में फैकल्टी ऑफ लीगल स्टडीज के अधिष्ठाता प्रोफेसर (डॉ०) बोधिसत्व आचार्य, विभागाध्यक्ष, शिक्षकगण एवं 300 से अधिक विधि संकाय के छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।




