इमली खेड़ा आंगनबाड़ी विवाद: जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर सवाल, जनता पूछ रही—किसके भरोसे व्यवस्था?
इमली खेड़ा आंगनबाड़ी केंद्र का समय पर न खुलना अब सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों की नाकामी का प्रतीक बनता जा रहा है। बार-बार शिकायतों, फोटो-वीडियो और स्थानीय लोगों के विरोध के बावजूद क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि मौन साधे बैठे हैं। सवाल यह है कि जनता ने जिन्हें आवाज़ उठाने के लिए चुना, वही आज क्यों खामोश हैं?

ग्रामीणों का आरोप है कि आंगनबाड़ी केंद्र महीनों से अनियमित चल रहा है। बच्चों का पोषण, गर्भवती और धात्री महिलाओं की सेवाएं प्रभावित हो रही हैं, फिर भी न विधायक बोल रहे हैं, न पार्षद/प्रधान सक्रिय दिख रहे हैं। क्या जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी सिर्फ चुनाव के समय तक ही सीमित है?
स्थानीय लोगों का गुस्सा इस बात पर है कि केंद्र पहले भी विवादों में रहा, खबरें चलीं, मगर जनप्रतिनिधियों ने न निरीक्षण किया, न अधिकारियों पर दबाव बनाया। जनता पूछ रही है—क्या ये चुप्पी किसी मिलीभगत का संकेत है, या फिर जनहित अब प्राथमिकता में नहीं रहा?

अब इमली खेड़ा की जनता साफ कह रही है:
या तो जनप्रतिनिधि जवाब दें और कार्रवाई कराएं, या फिर अपनी निष्क्रियता की जिम्मेदारी लें।
क्योंकि आंगनबाड़ी की बदहाली सिर्फ एक केंद्र की नहीं, पूरी जनप्रतिनिधि व्यवस्था पर सवाल है।




