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*क्या अब शिक्षा में भी ‘पहाड़ बनाम मैदान’ का भेदभाव?*

हरिद्वार के एमपीएच छात्र महीनों से परिणाम की प्रतीक्षा में, भविष्य अधर में लटका*

 

उत्तराखंड में “पहाड़ बनाम मैदान” की बहस अब केवल राजनीति और विकास कार्यों तक सीमित नहीं रह गई है। अब इसका असर राज्य के शैक्षणिक संस्थानों में भी देखने को मिल रहा है। श्रीदेव सुमन उत्तराखंड विश्वविद्यालय से संबद्ध भारतीय महाविद्यालय, बेग़मपुर (रुड़की) के एमपीएच (Master of Public Health) पाठ्यक्रम के छात्र-छात्राओं का भविष्य इन दिनों विश्वविद्यालय प्रशासन की लापरवाही की भेंट चढ़ता नज़र आ रहा है।

छात्रों का कहना है कि उन्होंने समय पर परीक्षा दी, फीस जमा की, और अपने सभी शैक्षणिक कार्य पूरे किए, लेकिन इसके बावजूद कई महीनों से उनका परिणाम घोषित नहीं किया गया है। परिणाम जारी न होने के कारण छात्र न तो उच्च शिक्षा के लिए आवेदन कर पा रहे हैं, न ही किसी नौकरी में अवसर प्राप्त कर रहे हैं।

 

“हमने सब कुछ समय पर किया, फिर भी हमारा भविष्य अधर में” — छात्रों की पीड़ा

एमपीएच छात्रों ने बताया कि विश्वविद्यालय ने सत्र 2023–25 की द्वितीय सेमेस्टर परीक्षा का परिणाम अब तक जारी नहीं किया है, जबकि सत्र 2024–26 का पाठ्यक्रम पहले ही शुरू हो चुका है। छात्रों ने कहा कि लगातार प्रतीक्षा के कारण उनका एक पूरा वर्ष बर्बाद हो रहा है।

 

एक छात्रा ने कहा —

 

“हमने समय पर परीक्षा दी, फीस भरी और सभी कार्य पूरे किए। फिर भी परिणाम नहीं आ रहा। ऐसा लगता है जैसे हमारी मेहनत किसी फाइल में दबकर रह गई हो।”

छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन की यह चुप्पी अब केवल प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि मैदान क्षेत्र के कॉलेजों के प्रति उपेक्षा का संकेत दे रही है।

एक छात्र प्रतिनिधि ने कहा —

“क्या अब शिक्षा में भी पहाड़ और मैदान का फर्क किया जा रहा है? विश्वविद्यालय को सभी छात्रों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए। यह सिर्फ परिणाम की बात नहीं, हमारे पूरे करियर की बात है।”

 

*शिक्षा में समानता की जरूरत-*

उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में, जहाँ पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों के बीच विकास का अंतर पहले से चर्चा का विषय है, अब शिक्षा में भेदभाव के आरोप नई चिंता पैदा कर रहे हैं।

शिक्षा समानता और पारदर्शिता की बुनियाद पर खड़ी होती है — और यदि वहीं असमानता के संकेत दिखने लगें, तो यह राज्य के भविष्य के लिए गंभीर प्रश्न है।

 

*अंत में सवाल यही —*

क्या राज्य सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन इस असमानता की खाई को पाटने की कोशिश करेंगे,

या छात्रों का यह संघर्ष भी फाइलों और बयानों में गुम होकर रह जाएगा?

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